Bachho mein sampratyay vikas ki abdharna aur mansik prakritaan

हैलो दोस्तों,

 स्वागत है आप सभी का हमारे वेबसाइट Rasoteach में। आज के पोस्ट में मैं आप लोगों को संप्रत्यय विकास के बारे में बताऊंगी कि बच्चों में संप्रत्यय विकास ( concept development) की अवधारणा कैसे विकसित होती है और संप्रत्यय विकास से संबंधित मानसिक प्रक्रियाओ को बताने वाली हूं।

बच्चों में संप्रत्यय विकास की अवधारणा और मानसिक प्रकटीकरण?


एक बच्चा पहली बार कौए को देखता है। तो वह देखता है कि  कौए का रंग काला है, उसके दो पंख है, दो आंखें हैं, एक चोच है और वह उड़ सकता है।



 वह बच्चा अपने परिवार के सदस्यों को उसे कौआ कहते हुए बार-बार सुनता है तो वह भी उस पक्षी के सामान विशेषता वाले पक्षी को कौआ कहने लगता है।


 इस तरह से बच्चा भी कौआ  के संप्रत्यय को सीख लेता है और उसके मस्तिष्क में कौए से संबंधित एक विचार प्रतिमा या प्रतिमान का निर्माण हो जाता है।
इसी विचार प्रतिमा या प्रतिमान को संप्रत्यय कहते हैं।

 धीरे-धीरे बच्चा बिल्ली, मेज, कुर्सी, वृक्ष आदि सैकड़ों संप्रत्ययो का निर्माण कर लेता है।

 दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वस्तुओं के सामान्य गुणों के आधार पर बनने वाले मानसिक प्रारूप को संप्रत्यय कहते हैं


संप्रत्यय वास्तव में चयनात्मक तंत्र है जिसमें व्यक्ति उपस्थित उत्तेजना तथा पूर्व अनुभव के बीच संबंध स्थापित करता है।


 ऊपर के उदाहरण पर यदि हम ध्यान दें तो यह बात स्पष्ट हो जाएगा। बच्चों में कौआ से संबंधित पूर्व अनुभव पहले से है जब वह किसी स्थान पर दूसरे कौआ को देखता है तो वह इसका संबंध अपने पूर्व अनुभव के साथ जोड़ लेता है और कहता है कि यह  कौआ है।


 यदि वह मैना को देखता है तो अपने अनुभव के साथ इसका संबंध नहीं जोड़ पाता है।

 अर्थात वह समझने लगता है कि यह  कौआ नहीं है। इससे हम समझते हैं कि बच्चों में संप्रत्यय के आधार पर उसकी पूर्व अनुभव संवेदनाएं और प्रत्यक्षीकरण होते हैं।

 बच्चों में संप्रत्यय विकास के संदर्भ में माना जाता है कि पहले इनमें मूर्त संक्रियात्मक जैसे माता-पिता आदि विकसित होते हैं और बाद में अमूर्त संप्रत्यय जैसे - खुशी, दुख आदि विकसित होते हैं।


 दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि बच्चों में संप्रत्यय विकास सरल एवं मूर्ति से जटिल एवं अमूर्त की ओर होता है।

 बच्चों में पहले एक अस्पष्ट संप्रत्यय विकसित होता है।

 बाद में जब उनके संज्ञानात्मक विकास का स्तर बढ़ता है तो वह एक स्पष्ट एवं विशिष्ट संप्रत्यय विकसित कर लेते हैं।

 साथ ही कहा जा सकता है कि बच्चों मे संप्रत्यय श्रेणीबद्ध होते हैं। जैसे -जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है, वे बहुत सारे जटिल संप्रत्ययों को सीख लेते हैं और उन्हें आपस में भी नियम स्पष्ट रखने के लिए एक श्रेणी में से सुव्यवस्थित कर लेते हैं।

 लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि हर बच्चे संप्रत्यय विकास और उस पर आधारित चिंतन में आधारभूत समानताओं के साथ ही कई विविधताएं भी हो सकती है।

 तभी तो किसी एक चीज के बारे में ही यदि अलग-अलग बच्चों से पूछे तो हो सकता है कि वे अलग - अलग जवाब दें।

 उदाहरण के तौर पर यदि बच्चों को कुछ फलों और सब्जियों को देकर उन्हें वर्गीकरण करने के लिए कहा जाए तो हो सकता है कि सामान्यत: उन्हें फल और सब्जी की दो कोटियों में वर्गीकृत कर दे।

 ऐसा भी हो सकता है कि वे उस कोटि से आगे बढ़ते हुए कुछ उपकोटियों में भी उन्हें दोबारा वर्गीकृत करें।

यह भी हो सकता है कि बच्चे वर्गीकरण की कोई और कसौटी अपनाएं।

संप्रत्यय विकास से संबंधित मानसिक प्रक्रियाओं 


संप्रत्यय निर्माण करने में बच्चों को विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है जिनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:-

1. निरीक्षण ( observation) :- बच्चे अवलोकन के माध्यम से विभिन्न संप्रत्यय या मानसिक प्रतिमाओं का निर्माण करता है।

 उदाहरण के लिए एक नवजात शिशु कई चेहरों को देखता है आवाजें सुनता है, कई तरह के स्वाद से परिचित होता है, उसके आधार पर संप्रत्यय बनाता है।


 उसी तरह विद्यालय में बच्चों को विभिन्न प्रकार के शिक्षण उपयोगी वस्तुओं या प्रयोगों को दिखाकर उनमें संप्रत्यय निर्माण किया जा सकता है। जैसे- कलम पेंसिल कॉपी आदि।



2. तुलना (Comparison) :- अवलोकन के माध्यम से बच्चे तरह-तरह के चीजों से परिचित होने के साथ-साथ उनमें तुलना करना भी सीखते हैं।

 जैसे बच्चे अपने कपड़ों में तुलना करते हैं, कौन सा खिलौना लेना है या कौन सा खिलौना लेना है या किस गिलास में पानी पीना है।

 इन सब के दौरान वे तुलना करते रहते हैं। तुलना करने की कई कसोटियां हो सकती है। जैसे- आकार, रंग, बनावट, उपयोगिता आदि उसी तरह कलम, पेंसिल, चौक में तुलना करना।

3. पृथक्करण ( abstraction) :- वुडवर्थ के अनुसार प्रत्येक रचना का आधार पृथक्करण है।

 उनके अनुसार भिन्न- भिन्न वस्तुओं में समान तत्वों को अलग कर लेना ही प्रत्यय रचना है। बच्चे सामान तत्वों वाली वस्तुओं को अन्य वस्तुओं से अलग करना सीख लेते हैं। उनका यही सीखना प्रत्यय रचना कहलाता है।


उदाहरण के तौर पर यदि हम बच्चों को विभिन्न रंग के कलम और किताब दें तो वे अलग-अलग रंग होने के बावजूद सभी कलमो को एक कोटि में और किताबों को अलग कोटि में रखेंगे।


 ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने उनमें वैसे गुण को पृथक करके उन्हें वर्गीकरण की कसौटी बना ली जो प्रमुख है।।


3. सामान्यीकरण ( Generalisation) :- सामान गुणों का संग्रह करने के कारण बच्चों के लिए काले, लाल, सफेद आदि रंगो के कलम में कोई अंतर नहीं रह जाता है।


 उसी तरह उन्हें किसी भी रंग आकार स्वरूप की कॉपी दी जाए, तो वे उसे कॉपी ही कहेंगे।

 वैसे ही जब कोई बच्चा देखता है कि एक खास तरह के पक्षी को लोग तोता कहते हैं तो इस प्रकार के पक्षी के समरूप तत्व या सामान विशेषताओं को समझ लेता है और बाद में उन विशेषताओं वाले पक्षी को तोता कहने लगता है।

 अतः उनका संप्रत्यय स्पष्ट रूप से धारण कर लेता है।



सक्रिय खोज सिद्धांत ( Active search theory) के अनुसार सामान्यीकरण ( Generalisation) को प्रत्यय विकास का आधार माना जाता है।

 इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्यय के विकास में व्यक्ति का सक्रिय सहयोग रहता है।

 सक्रिय खोज सिद्धांत के अनुसार पहले व्यक्ति एक परिकल्पना का निर्माण करता है फिर अपने अनुभव के आधार पर उसकी सोच उसकी जांच करता है और आवश्यकता के अनुसार उसमें परिवर्तन लाता है जिससे एक खास प्रत्यय का निर्माण होता है।



5. परिभाषा निर्माण ( Definition formation) :-बच्चे उपर्युक्त चारों स्तरों के माध्यम से संप्रत्यय का निर्माण करते हैं।

 उन सब के आधार पर उनमें विभिन्न वस्तुओं के बारे में वैसी परिभाषाएं अर्थात उनकी विशेषताओं का विवरण भी देने की क्षमता विकसित हो जाती है।


 उदाहरण के तौर पर जैसे ही हम खाना कहते हैं जो वे उससे संबंधित बुनियादी परिभाषा को तुरंत गढ़ लेते हैं।

 उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि समझौते निर्माण में कौन-कौन सी मानसिक प्रक्रियाए होती है।

 साथ ही यह समझे कि बच्चों ने संप्रत्यय विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसे अपनी पुरानी अनुभूतियों ( old experience) एवं नई अनुभूतियों ( new experience) के बीच संबंध स्थापित करने की पर्याप्त क्षमता हो।

 जब बच्चों यह पाता है कि नई वस्तुओं में बहुत सारी अनुभूतियां वैसी ही है जो उसके गत अनुभव ( old experience) के अनुरूप है तो उससे संप्रत्यय का विकास उसमें तेजी से होता है।

तो दोस्तों, आज के पोस्ट में मैंने आपको बताया कि संप्रत्यय विकास क्या होता है? इसकी अवधारणा क्या है? और संप्रत्यय विकास से संबंधित मानसिक प्रक्रियाओं को बताया। 

तो दोस्तों, मुझे उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा।

 अगर इस पोस्ट से संबंधित कोई भी प्रश्न हो तो बेझिझक कमेंट करके पूछ सकते हैं यह पोस्ट पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

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