Baccho ke sharirik aur manogatyatmak vikas me mata pita aur shikshak ki bhumika | बच्चों के शारीरिक एवं मनोगत्यात्मक विकास में अभिभावकों और शिक्षक की भूमिका

 हैलो दोस्तों,


स्वागत है आप सभी का हमारे वेबसाइट Rasoteach में। आज की पोस्ट में हम जानेंगे कि बच्चों के शारीरिक एवं मनोगत्यात्मक विकास में अभिभावको और शिक्षकों की क्या भूमिका होती है? 

बच्चों के शारीरिक और  विकास में मनोगत्यात्मक विकास में अभिभावकों की भूमिका


शारीरिक और मनोगत्यात्मक विकास अनुवांशिक तथा वातावरणीय कारक दोनों प्रकार के कारकों से प्रभावित होता है। 


अनुवांशिक गुण वह गुण है जो बच्चे अपने माता-पिता और पूर्वजों से प्राप्त करते हैं। साथ ही हम उसके लालन-पालन देखभाल जैसे संतुलित आहार एवं पोषण, सामाजिक आर्थिक स्थिति, परिवार का आस-पडस, संस्कृति, परिवेश आदि की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो उसने उसके अभिभावक द्वारा प्राप्त होती है।


बच्चों के शारीरिक विकास में व्यक्तिगत विभिन्नताएं होती है। बच्चों का कद और भाड़ का बढ़ाना एक ढांचे के अनुसार होता है। 


लेकिन शारीरिक और मनोगत्यात्मक विकास सही तरीके से हो इसमें अभिभावक उनकी मदद करते हैं। 


जैसे उंगली पकड़कर चलना, खड़ा होना, सीखना, बैठना सीखना, झुकना सीखना, आदि बालकों को संतुलित आहार नियमित दिनचर्या साथ ही साथ, शारीरिक क्रियाकलाप तथा उपयुक्त विश्राम देना अभिभावकों का दायित्व है, जिससे बालकों की मांसपशियों को स्वास्थ्य विकास को बढ़ावा मिलता है।

 इसे हम एक उदाहरण द्वारा इस प्रकार समझ सकते हैं।


राधा:-  रानी तुम्हारी बेटी तो 1 वर्ष में ही चलना शुरू कर दी।

 रानी:-  हां, मैंने और परिवार के अन्य सदस्यों ने इसके आहार एवं शरीर, हाथ पैर की मालिश पर पूरा ध्यान दिया जिससे यह जल्दी चलने लगी।

 राधा:-  सही बोल रही हो, मीना की बेटी भी 1 वर्ष की हो गई है लेकिन वह चलती नहीं है।

 असल में उसके घर के सदस्य बच्चे के खानपान और मालिश पर ध्यान नहीं देते।

 रानी :-  राधा, यह समय बच्चों के समुचित विकास का होता है इसलिए हम अभिभावकों को बच्चों को सही देखभाल अवश्य करनी चाहिए।

 नहीं तो, उनका सही ढंग से शारीरिक विकास नहीं हो पाता है और वे समय पर चलना दौड़ना खेलना नहीं सीख पाते हैं।

 उन्हें बढ़ती उम्र में बड़ों के सहयोग और प्यार की भी बहुत जरूरत होती है।


उपर्युक्त उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी बच्चों में शारीरिक विकास एक समान नहीं होता है। शिशु की हड्डियां आसानी से नहीं टूटती परंतु कोमल और लचीली होने के कारण उनमें विकृति तथा विरूपता आ जाती है। 

यदि अभिभावक द्वारा उनकी देखभाल सही तरीके से नहीं होती है तो बच्चों के बच्चे के शारीरिक विकास में विकृति आ जाती है। 

परिणाम स्वरूप लोगों द्वारा उन्हें नाटा, मोटू, मरियल या ढीलू जैसे शब्दों से संबोधित किया जाता है जो उनके आगे की क्रियाकलाप को भी प्रभावित करता है।  

अतः यह आवश्यक है कि ये बच्चे जो दूसरों से भिन्न है उन्हें नकारात्मक शब्दों द्वारा चिंतित नहीं किया जाए और अभिभावकों का यह भी दायित्व है कि समय पर विशेषज्ञ, डॉक्टर, मनोवैज्ञानिकों की सहायता से उनकी समस्याओं को दूर करें।

बच्चों के शारीरिक एवं मनोगत्यात्मक विकास में शिक्षकों की भूमिका


शारीरिक विकास व्यक्तित्व के सभी पक्षों के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए इस पर विशेष ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है। 

बच्चे अपने बचपन तथा किशोरावस्था का एक सार्थक भाग विद्यालय में शिक्षकों के साथ में बिताते हैं।

 शिक्षक को वे अपने आदर्श मानते हैं तथा उनके व्यवहार से प्रभावित होते हैं।


 ऐसे में शिक्षक उनके शारीरिक एवं मनोगत्यात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वह बच्चों में मौजूद खूबियों एवं कमियों को पहचान कर उनके अभिभावक को बता सकते हैं। 

जिससे उनके अभिभावक उन बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए उचित कदम उठा सके।  

शिक्षक मुख्यत: दो कौशलों द्वारा बच्चों के मनोगत्यात्मक विकास में सहयोग करते हैं। एक तो स्थूल गत्यात्मक कौशल जैसे व्यायाम, दौड़ना, खेल की क्रिया, नृत्य आदि के माध्यम से तथा दूसरा सूक्ष्म गत्यात्मक कौशल जैसे चित्रकला, लिखना, सिलाई करना, रंग भरना आदि के प्रशिक्षण के माध्यम से जैसे - जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं तथा ऊपर की कक्षा में जाते हैं उनके खेलने, चलने, उठने, बैठने आदि का ढंग बदलने लगता है।


 उसमें भी शिक्षक द्वारा यह सुनिश्चित किया जाता है कि बच्चा कैसे बैठता है? खड़ा कैसे होता है? झुकता कैसे हैं? बच्चा जूता और कपड़ा सही ढंग से पहनता है या नहीं?


उपर्युक्त सभी बातें बच्चों के शारीरिक और मनोगत्यात्मक  विकास के लिए ध्यान देने योग्य है जो उनके विकास में सहायक होती है। बच्चे के अंदर पाए जाने वाले विभिन्न गुणों तथा खेल, चित्रकारी, विभिन्न प्रकार के दस्तकारी कार्य जैसे - सूूत काटने, धातु कार्य, दर्जीगिरी, खिलौने बनाना, बागवानी, जूड़ो - कराटा आदि सिखाने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। 


हम शिक्षक एक रूप में बच्चों के व्यक्तिगत विभिन्नता को ध्यान में रखकर उसके साथ अनुकूल व्यवहार कर सकते हैं।  


अब हमें शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत समावेशी शिक्षा के उद्देश्य को प्राप्त करना है। ऐसे में शिक्षक के रूप में हमारा यह कर्तव्य बनता है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चे सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चे, सभी को मुख्यधारा से जोड़कर उनके विकास में अपना योगदान देना है।  


संक्षिप्त में यह कहा जा सकता है कि शिक्षक, विद्यार्थियों को इस प्रकार ढालते हैं कि विद्यार्थी अपने स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं का पर्याप्त विकास कर राष्ट्र के विकास में भरपूर योगदान दे सके। 


तो दोस्तों, आज के पोस्ट में मैंने आपको बच्चों के शारीरिक एवं मनोगत्यात्मक विकास में अभिभावको और शिक्षकों की भूमिका के बारे में बताया।

 मुझे उम्मीद है कि आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा। अगर आपको इस पोस्ट से संबंधित कोई भी प्रश्न हो तो बेझिझक पूछ सकते हैं। 

यह पोस्ट पढ़ने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

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