Swa abdharna ( self concept) ke vikas se kya tatpary hai | sw abdharna ko prabhavit karne wale karak kon kon se hai?

हैलो दोस्तों,

 स्वागत है आप सभी का हमारे वेबसाइट Rasoteach में। आज के पोस्ट में मैं आपको बताने वाली हूं कि स्व अवधारणा का विकास से क्या तात्पर्य है और इसको प्रभावित करने वाले कारक कौन - कौन से है?

स्व अवधारणा का विकास से हमारा क्या तात्पर्य है? इसे प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?


स्व अवधारणा का विकास से हमारा क्या तात्पर्य है?

बच्चों के आत्म - प्रत्यय में दो प्रकार की प्रतिभाएं होती हैं। इन आत्म प्रतिभाओं का विकास शारीरिक एवं मनोवैज्ञानिक तरीके से होता है। 


शारीरिक आपने प्रतिभाएं शारीरिक बनावट और रंग रूप से होता है। लेकिन मनोवैज्ञानिक आत्म प्रतिभाओं में बालकों की भावनाएं, विचार, संवेग, साहस, ईमानदारी, आत्मविश्वास और आकांक्षाएं इत्यादि शामिल होती है। 


बालक की उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है वैसे-वैसे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रतिभाएं आपस में एक दूसरे से सामंजस्य स्थापित कर लेती है। 


आत्म प्रत्यय का विकास जीवन के प्रथम वर्ष में शुरू हो जाता है। जब बच्चा अपनी मां की आवाज पहचानने लगता है। आत्म प्रत्यय व्यक्ति के विचारों एवं अनुभवों से बनता है। यह परिवर्तनशील होता है। 


स्व अवधारणा की प्रक्रिया एक ऐसी संज्ञानात्मक एवं मानसिक प्रक्रिया है जो कि विविध आंतरिक एवं बाह्य पक्षों से प्रभावित होती है।


स्व अवधारणा को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?


 स्व अवधारणा को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक है:- 

1. शिक्षक का व्यवहार :- शिक्षक का व्यवहार यदि छात्रों के प्रति सकारात्मक रूप में होता है तो वह छात्रों को उनके गुणों एवं योग्यताओं के बारे में उचित मूल्यांकन करके उनको सही निर्देशन एवं परामर्श प्रदान करते हैं।


 इससे स्व अवधारणा उचित रूप में विकसित होती है क्योंकि सकारात्मक वातावरण में छात्र भी शिक्षक के समक्ष अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन खुलकर कर सकेगा। 


इसके विपरीत नकारात्मक व्यवहार से छात्रों का प्रदर्शन वास्तविक एवं स्वतंत्र कार्य के रूप में नही होगा। इसे स्व अवधारणा का विकास सर्वोत्तम रूप से नहीं होगा। इसलिए स्व अवधारणा के विकास में शिक्षक का व्यवहार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


2.  विद्यालय का वातावरण :- विद्यालय का वातावरण स्व अवधारणा को व्यापक रूप में प्रभावित करता है।


 यदि विद्यालय का वातावरण सुखद एवं छात्रों के शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला है तो छात्र विद्यालय में स्वतंत्र रूप से अपने कार्य एवं व्यवहार तथा मन: स्थिति का प्रदर्शन कर सकेंगे। 


इस आधार पर स्व अवधारणा का विकास अच्छी तरह से हो सकेगा। इसके विपरीत अगर विद्यालय का वातावरण चिंता युक्त तथा और व्याकुलतापूर्ण होता है तब बालक अपने कार्य व्यवहार एवं मन:स्थिति का प्रदर्शन अच्छी तरीके से नहीं कर पाते हैं इससे स्व अवधारणा का विकास सर्वोत्तम रूप से संभव नहीं हो पाता है।


 इस प्रकार हमने देखा कि विद्यालय का वातावरण स्व अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


3. छात्रों की सोच:- छात्रों की सोच का स्व अवधारणा  के विकास पर व्यापक रूप से प्रभाव पड़ता है। 


जैसे यदि छात्र की सोच तथा उसका व्यवहार सकारात्मक होगा तो इसके परिणामस्वरूप वह प्रत्येक कार्य एवं व्यवहार को मर्यादा में रहकर एवं उपयोगी रूप से संपन्न करेगा।


 इसे स्व अवधारणा का विकास अच्छी तरीके से हो पाएगा। लेकिन यदि छात्रों की सोच नकारात्मक होगी तो उनकी मन: स्थिति एवं कार्य व्यवहार नकारात्मक रूप में होगा। 


 इस स्थिति में स्व अवधारणा का विकास अच्छी तरीके से नहीं हो पाएगा।


4. चिंता :- यदि छात्र के समक्ष चिंताजनक एवं व्याकुलतापूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है या किसी कारणवश विद्यालय या परिवार के कारणों से छात्र चिंतित रहते हैं तो उसमें स्व अवधारणा का विकास सर्वोत्तम तरीके से नहीं हो पाता है क्योंकि इस प्रकार की स्थिति में छात्र का व्यवहार वास्तविक एवं मन:स्थिति के अनुरूप नहीं होता है। 


वही चिंता रहित स्थिति में स्वतंत्र रूप से कार्य एवं व्यवहार का प्रदर्शन छात्रों द्वारा किया जाता है तथा यह स्थिति सुधारना के विकास के लिए उपयोगी मानी जाती है।



4. सामाजिक संपर्क :- सामाजिक संपर्क की स्थिति में स्व अवधारणा का विकास व्यापक रूप से होता है क्योंकि सामाजिक संपर्क में छात्र अपनी मन: स्थिति एवं सामाजिक अपेक्षाओं को जोड़ते हुए व्यवहार एवं कार्यों का निर्धारण करते हैं।


 इस आधार पर ही वास्तविक सामाजिक कौशल एवं अवधारणाओं को विकसित करते हैं। 


यह स्थिति स्व अवधारणा के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है क्योंकि इसमें सामाजिक व्यक्तियों एवं परंपराओं द्वारा भी इस अवधारणा निर्माण में सहायता मिलती है।


6. आयु वर्ग :- स्व अवधारणा के विकास की प्रक्रिया में आयु वर्ग द्वारा भी अपना प्रभाव दिखाया जाता है। विद्वानों का मानना है कि स्व अवधारणा का विकास 3 वर्षों से प्रारंभ हो जाता है तो कुछ विद्वानों का मानना है कि स्व अवधारणा का विकास 4 से 8 वर्ष की अवस्था में होता है। 


इससे यह सिद्ध होता है कि इस अवधारणा के विकास के लिए आयु की परिपक्वता का होना भी आवश्यक माना जाता है।



7. संस्कृति :- संस्कृति का प्रभाव स्व अवधारणा के विकास पर व्यापक रूप से पड़ता है। बच्चे जिस वातावरण में रहते हैं उस वातावरण की संस्कृति और उसके मूल्यों को देखते हैं, पहचानते हैं और आत्मसात कर लेते हैं।

 जैसे - जैसे वह बड़े होते हैं उस संस्कृति के अनुसार ढलते जाते हैं और इस प्रकार से उनका विकास प्रभावित होता है।


8. अभिभावक :-  स्व अवधारणा के विकास में अभिभावक भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।


जैसे - एक अभिभावक अपने बालक को की योग्यता एवं मन: स्थिति के अनुसार उसके लिए व्यवस्था उपलब्ध कराते हैं। 


इस स्थिति में बालक में स्व अवधारणा के विकास की प्रक्रिया सर्वोत्तम होती है। जिससे इसके विपरीत जब अभिभावक बालक पर अपने विचारों को जानने का प्रयास करते हैं तथा उसकी वास्तविकता से परिचित नहीं कराते है तब यह माना जाता है कि स्व अवधारणा के विकास की प्रक्रिया को कुप्रभावित होती है।


9. आत्म संतोष :- स्व अवधारणा के विकास में आत्म संतोष एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


 अगर बच्चे में आत्म संतोष की भावना है तो उनमें स्व अवधारणा की विकास भी अच्छी तरह होगी।


 जैसे एक छात्र अपने कार्य एवं व्यवहार में स्वयं संतुष्ट होता है तथा शिक्षक द्वारा उसको प्रमाणित किया जाता है कि छात्र का व्यवहार संतोषजनक है।


 इस प्रकार की स्थिति में छात्र अपनी अंतर्निहित प्रतिभाओं  एवं  बाह्य व्यवहार की स्थिति के वास्तविक रूप से परिचित हो जाता है। 


इसके विपरीत जब एक छात्रा अपने कार्य एवं व्यवहार से संतुष्ट नहीं होता तब वह स्व अवधारणा का विकास सर्वोत्तम रूप से नहीं कर सकता है।


उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट होता है कि स्व अवधारणा के विकास में विविध प्रकार के कारकों का महत्वपूर्ण योगदान है।


 लैंगिक अंतर द्वारा स्व अवधारणा का विकास भी प्रभावित होता है। छात्रों की तुलना में छात्राओं में स्व अवधारणा के विकास की प्रक्रिया में पर्याप्त अंतर होता है।


जैसे छात्राओं एवं छात्रों के विविध कार्य एवं व्यवहार में पर्याप्त अंतर पाया जाता है।

 छात्राएं अपनी लड़की मित्रों के साथ ही खेलना पसंद करती है जबकि छात्रों द्वारा लड़के एवं लड़कियों के साथ खेलना पसंद करते है।


 छात्रों में बहिर्मुखी व्यक्तित्व की धारणाएं विकसित होती है। इस प्रकार अनेक परिस्थिति कारकों द्वारा स्व अवधारणा के विकास को प्रभावित किया जाता है।

धन्यवाद

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Post kaisa laga jarur batay