Swa ki abdharna ( Self concept) | swa ke prakar aur swa ke kon - kon pehlu hai tatha inke pramukh ghatak

 हैलो दोस्तों,


 आप सभी का हमारे वेबसाइट Rasoteach में स्वागत है। आज के पोस्ट में मैं आपको स्व की अवधारणा के बारे में बताने वाली हूं कि स्व की अवधारणा क्या है, इसके कौन - कौन से पहलू है, और इसके कितने प्रकार है?

Swa ki abdharna | swa ke prakar aur swa ke kon - konse  pehlu hai tatha inke pramukh ghatak

तो चलिए जान लेते हैं स्व की अवधारणा से हमारा क्या तात्पर्य है?

 स्व की अवधारणा से हमारा क्या तात्पर्य है?

स्व से तात्पर्य अपनी को एक वस्तु मानकर स्वयं के बारे में विचारों एवं अनुभूतियों की समग्रता विकसित करने से होती है। 

एक नवजात शिशु को स्व के बारे में कोई ज्ञान नहीं होता है परंतु जैसे - जैसे वह बड़ा होता है उसकी अंत:क्रियाएं अन्य व्यक्तियों से होती है तथा उसमें भी स्व का विचार उत्पन्न होता है।



 स्व की संरचना व्यक्ति को अपनी अनुभूतियों एवं दूसरों के बारे में प्राप्त अनुभूतियों के आलोक में परिवर्तित होता है। स्व के उन गुणों की एक सूची होती है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने आप का वर्णन करता है।

इन्हीं गुणों के आधार पर व्यक्ति की अपनी पहचान तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान स्थापित हो पाती है।

 जैसा कि हम सभी जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। प्रत्येक व्यक्ति समाज में रहकर ही समाज के मानकों को अपनाता है तथा उन्हीं मानकों के अनुरूप ही स्वयं को डालता है। समाज में रहकर व्यक्ति सभी प्रकार के कार्य जैसे विद्यालय संबंधी, विवाह संबंधी एवं जीवन - मरण संबंधी सभी कार्यों को करता है।

 मनुष्य का समाज में रहकर किया जाने वाला व्यवहार ही सामाजिक व्यवहार कहलाता है। जिस सामाजिक व्यवहार का पूर्ण उत्तरदायित्व मनुष्य का ही होता है।

 इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य स्वयं के द्वारा किए गए कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं ही लेता है। परंतु यहां सर्वप्रथम यह जानना अति अनिवार्य है कि मनुष्य के कार्य कौन-कौन से होते हैं जिनकी जिम्मेदारी वह लेगा। यहां हम इन कार्यों के विषय में चर्चा करेंगे।


व्यक्ति के जीवन में स्वयं का स्थान अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।  क्योंकि किसी भी सामाजिक आवश्यकता एवं लक्ष्य का संगठन इसी स्व के माध्यम से होता है। 


व्यक्ति केवल बाहरी जगत की वस्तुओं के प्रति अनुक्रिया नहीं करता बल्कि इसी प्रकार की प्रतिक्रियाएं वह अपने शरीर, विचारों एवं भावों के प्रति भी करता है।

 इन सभी अनु क्रियाओं के निष्कर्ष स्वरूप उसमें आत्म संज्ञान विकसित होता है। व्यक्ति की अनेक आवश्यकताओ का संबंध इसी आत्म की प्रतिरक्षा एवं संवर्धन से रहता है।

आप में एक ऐसा आकर्षण केंद्र है जिसके इधर उधर आने का आवश्यकताएं एवं लक्ष्य संगठित होते रहते हैं। स्व अथवा आत्म अन्य व्यक्तियों के संबंध में एक मनुष्य के विचारों और कार्यों की चेतना है।

स्व का तात्पर्य मनुष्य के स्वयं के व्यक्तित्व से होता है जिसमें उनकी कुछ धारणाएं होती हैं।

स्व की परिभाषा:-

बालक समाज रूपी दर्पण में जैसा आपने आपको देखता है वैसा ही उसका आत्म में विकसित होता है।

 आत्म की परिभाषा हम इस प्रकार दे सकते हैं, आत्म व्यक्ति के रूप में वह है जैसा व्यक्ति को लोग देखते हैं या जैसा कि वह अंतः क्रिया के संदर्भ में अपने आप को देख पाया जानता है वही उसका आत्म है।


स्व एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में :- स्व अवधारणा की प्रक्रिया में मनन, चिंतन, तर्क एवं विभिन्न प्रकार की अवधारणाओं का निर्माण एवं सत्यापन आदि कार्य संपन्न होते हैं।

 जैसे एक छात्र यह अनुभव करता है कि वह दार्शनिक विचारधारा का छात्र है तो उसको दूसरे साथियों एवं शिक्षकों द्वारा बताया जाता है कि वह दार्शनिक विचारों में अधिक रुचि रखता है। इन सभी तथ्यों का वर्णन इस प्रकार से मनोविश्लेषण एवं संश्लेषण करके इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि वह एक दार्शनिक है। इस प्रकार स्व अवधारणा को एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में माना जाता है।


 अतः यह स्पष्ट होता है कि स्व अवधारणा की प्रक्रिया विद्यालय, समाज एवं शिक्षक द्वारा छात्रों के संदर्भ में विविध विचार प्रस्तुत करके तथा छात्रों द्वारा अनुभव करके संपन्न होती है। इसे पूर्ण मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक प्रक्रिया के रूप में माना जाता है।

स्व के प्रकार

स्व के प्रकार निम्न है:-

1.  व्यक्तिगत स्व या आत्मन :- व्यक्तिगत स्व  में ऐसी उन्मुखता होती है जिसमें व्यक्ति मूलत:  अपने आपसे मतलब या अपने प्रति चिंता दिखलाता है। 

जैसे- व्यक्ति की जैविक अवस्थाओं जैसे भूख प्यास आदि में वह सिर्फ अपनी भूख प्यास आदि कम करने के बाद सोचता है। 

यह व्यक्तिगत स्व का उदाहरण होगा जो सचमुच में एक जैविक स्व है। उसी तरह से व्यक्ति जब अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता, व्यक्तिगत उपलब्धि की बात सोचता है तो यह भी उसका व्यक्तिगत स्व का एक उदाहरण है। 

2. सामाजिक स्व :-  सामाजिक स्व की उत्पत्ति दूसरों के साथ ही गई अंत:क्रियाओं  के परिणामस्वरुप होती है ऐसा स्व मूलतः व्यक्ति की जिंदगी के कुछ विशेष पहलुओं जैसे सहयोग, एकता, दूसरों के लिए अपनी इच्छा का त्याग, समर्थन आदि पर अधिक बल डालता है। 

इस तरह के स्व ने व्यक्ति सामाजिक संबंधों एवं परिवार की अहमियत पर अधिक बल डालता है इसलिए इसे पारिवारिक संबंध आत्मक सवा कहा जाता है।

 संसार के मनोवैज्ञानिकों द्वारा स्व के अध्ययन में दिखलाएं गई रुचियो का परिणाम यह हुआ कि स्व के कई पहलुओं के बारे में लोगों को यह जानकारी मिली है। 

स्व के पहलू

 इनमें से स्व  के स्पष्ट रूप से तीन पहलुओं पर मनोवैज्ञानिकों के बीच सहमति बनाए बन पाई है जो इस प्रकार है:-


1. स्व का संज्ञानात्मक पहलू : आत्म संप्रत्यय:- आत्मन या स्व के संज्ञानात्मक बालों को आत्म संप्रत्यय कहा जाता है। आत्म संप्रत्यय या स्व संप्रत्यय में व्यक्ति अपने दैहिक, सामाजिक तथा शैक्षिक सामर्थ्य का संज्ञानात्मक मूल्यांकन करता है। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है की आत्म संप्रत्यय में व्यक्ति को अपने बारे में एक खास तरह का विश्वास एवं ज्ञान होता है।


2. स्व का भावात्मक पहलू : आत्म सम्मान :- स्व की भावात्मक या संवेगात्मक पहलू होता है जिसे आपने सम्मान कहा जाता है। है इसे आत्म - मूल्य भी कहा जाता है। आत्म सम्मान स्व के प्रति एक भावात्मक यह संवेगात्मक प्रतिक्रिया होती है। सचमुच में व्यक्ति अपने बारे में कितना सकारात्मक या नकारात्मक भावना सकता है की ऊंचाइयों विश्वास होने पर व्यक्ति बहुत सारे सकारात्मक व्यवहार एवं उपलब्धियों को आसानी से प्राप्त कर लेता है तथा ऐसे लोग अपनी जिंदगी में काफी खुश होते हैं।

 बिना आपने सम्मान के होने पर व्यक्ति मनोवैज्ञानिक समस्याओं जैसे चिंता, विषाद आदि उत्पन्न हो जाते हैं।


3. स्व का व्यवहारात्मक पहलू : आत्म क्षमता:- आत्म क्षमता स्व का व्यवहार आत्मक पहलू है। आत्म क्षमता का संप्रत्यय बंडुरा का सामाजिक अधिगम का सिद्धांत पर आधारित है। 

आत्म क्षमता से तात्पर्य व्यक्ति के ऐसे दृढ़ विश्वास से होता है कि उन्हें ऐसा अमुख व्यवहार करने की क्षमता होती है जिससे वांछित परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।


 बंदुरा के अनुसार आत्म - क्षमता को विकसित किया जा सकता है। जिन व्यक्तियों में आत्म क्षमता अधिक होती है। वे लोग अपनी जिंदगी के हरेक परिस्थितियों पर पर्याप्त नियंत्रण रख पाते हैं और यहां तक कि उसे अपनी इच्छा अनुसार मोड़ भी पाते हैं।


 स्व अवधारणा के घटक अवधारणा के निम्नलिखित चार घटक है:-


1. स्व छवि:- स्व छवि एक ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति स्वयं को देखता है और प्रकृति के अनुसार में प्रत्येक व्यक्ति के अपने बारे में कुछ विचार होते हैं। यह विचार ही उसे उस व्यक्ति के स्व छवि होती हैं।


2. आदर्श स्व :-  'आदर्श स्व' यह बताता है कि व्यक्ति कैसा बनना चाहता है। यह व्यक्ति के आदर्श को इशारा करता है। यह व्यक्ति को एक विशेष प्रकार के व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है। 


3. दर्पण स्व :- 'दर्पण स्व' व्यक्ति विशेष का अवबोधन है कि दूसरे लोग उसके गुणों एवं विशेषताओं का किस प्रकार संबोधन करते हैं। दूसरे शब्दों में दर्पण हाय कैसे तरीके से है जिसमें व्यक्ति या सोचता है कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं।


4. वास्तविक स्व :- 'वास्तविक स्व'  एक वास्तविकता है कि आखिर व्यक्ति है क्या यह वास्तव में इस वाक्य सामान्य उसे भिन्न हो सकते हैं।


तो दोस्तों, आज के पोस्ट में मैंने आपको स्व की अवधारणा, इसके पहलू, और इसके प्रकरो के बारे में बताया।  अगर आपके मन में इस पोस्ट से संबंधित कोई भी प्रश्न हो तो कमेंट करके जरूर पूछ सकते हैं।

धन्यवाद।

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