Bloom taxonomy in hindi

  हैलो दोस्तों,

 आप सभी का हमारे वेबसाइट Rasoteach में स्वागत है। आज के पोस्ट में मैं आप लोगों को bloom taxonomy  | बी.एस ब्लूम का शैक्षिक उद्देश्य का वर्गीकरण बताने वाली हूं।


Bloom taxonomy in hindi


दोस्तों, हम सभी जानते हैं कि किसी भी कार्य को करने के लिए शिक्षण के उद्देश्य का होना अनिवार्य है क्योंकि उद्देश्य दिशा- निर्देशन एवं निर्धारण में सहायता करते हैं तथा शिक्षण की व्यूह रचनाओं तथा रचना कौशल को प्रयोग करने के लिए प्रेरित करते हैं।


Bloom taxonomy in hindi


 शिक्षण के मूल्यांकन को भी शिक्षण उद्देश्य प्रभावित करते हैं। लक्ष्य और अस्थायी और अस्पष्ट होते हैं जबकि उद्देश्य निश्चित होते हैं।


 शिक्षण और शैक्षिक उद्देश्य व्यापक होते हैं। शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति लंबे समय तक निरंतर प्रयत्नशील रहने से होती है जबकि शिक्षण उद्देश्यों की प्राप्ति बहुत ही कम समय में हो जाती है।


परिभाषा से स्पष्ट है कि शैक्षिक उद्देश्य वे शैक्षिक कार्यक्रम है जिनके द्वारा बालकों के व्यवहार में वांछित परिवर्तन लाने के प्रयास किए जाते हैं। कक्षा शिक्षण के परिवर्तन से शिक्षण उद्देश्य की प्राप्ति की जाती है।


शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण ( taxonomy of educational objectives) :-


बीएस ब्लूम तथा उनके सहयोगियों ने शिकागो विश्वविद्यालय में व्यक्ति के व्यवहार को 3 पक्षों में विभक्त किया, जिसे वर्गीकरण का नाम दिया जा सकता है।


 ब्लूम महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों परीक्षको को एक अमेरिकन समिति के द्वारा प्रस्तुत की गई, "शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण" नामक रचना के संपादक थे। 


यह वर्गीकरण क्रमबद्ध रूप से होता है जिसे चढ़ाव क्रम (taxonomy) कहां जाता है। अध्यापक अपने उद्देश्यों के निर्धारण में इसी क्रम का पालन करता है। 


यह परिवर्तन छात्र के व्यवहार परिवर्तन तथा उसकी प्राप्त अनुभव के आधार पर बनाया गया है। मानवीय व्यवहार के तीन पक्ष :-


1. ज्ञानात्मक ( cognitive ) इसे ज्ञान ( knowledge ) भी कहा जाता है।


2. भावात्मक ( effective ) यह मानवीय संवेदना से संबंधित है।


3. क्रियात्मक ( Psychomotor ) या मनोपेशीय (conative)


बीएस ब्लूम ने सीखने के उद्देश्यों को 3 पक्षों में विभाजित किया। वर्गीकरण की सहायता से अध्यापक अपने शिक्षण तथा सीखने के उद्देश्य को निर्धारित आसानी से कर सकते हैं।

 

ब्लूम ने 1956 में शैक्षिक उद्देश्यों को तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया:-


1. संज्ञानात्मक उद्देश्य ( cognitive objective)

2. भावात्मक उद्देश्य ( affective objective)

3. क्रियात्मक या मनोपेशीय उद्देश्य ( psychomotor or conative objective)

 

इन तीनों को अलग-अलग वैज्ञानिकों ने आगे विभाजित किया। 1956 में ब्लूम संज्ञानात्मक को, 1964 में ब्लूम, क्रोथ्वलह तथा मसीआ ने भावात्मक को और 1969 में सिंपसन ने क्रियात्मक को तथा 1972 में हैरो ने क्रियात्मक को वर्गीकृत किया।


बीएस ब्लूम ने शैक्षिक उद्देश्यों को तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित कारण उनको एक वर्गों में विभक्त निम्न प्रकार से किया है :-

शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण ( taxonomy of educational objectives) :-


1. संज्ञानात्मक पक्ष


ज्ञान 

बोध

 प्रयोग 

विश्लेषण 

संश्लेषण

 मूल्यांकन


2. भावनात्मक पक्ष


ग्रहण करना

 अनुक्रिया 

अनुमूल्यन 

प्रत्ययीकरण

 व्यवस्थापन

 चरित्र निर्माण


3. क्रियात्मक पक्ष


उद्दीपन

 कार्य करना 

नियंत्रण

 समायोजन 

स्वाभावीकरण 

आदत पड़ना, निर्माण




1. संज्ञानात्मक पक्ष  ( cognitive objective)

बौद्धिक योग्यता के विकास के लिए ब्लूम ने  संज्ञानात्मक पक्ष पर बल दिया। इसमें प्रत्यास्मरण तथा पहचान द्वारा विद्यार्थियों को तथ्यों, मूल्यों, विचारों, मान्यताओं, संप्रत्ययो शब्दावली का ज्ञान दिया जाता है और अधिक मानसिक क्षमताा को विकसित किया जाता है।


ब्लू ने अपनी पुस्तक "ज्ञानात्मक शैक्षिक उद्देश्यों का वर्गीकरण" ( Taxonomy of Educational objectives of Cognitive domain ) में इसे छः भागो में बांटा है।


ज्ञानात्मक पक्ष में ब्लू में शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्गीकरण किया है:-


वर्ग       -     सीखने की उपलब्धियां

1. ज्ञान -   विशिष्ट वस्तुओं का ज्ञान, साधनों का ज्ञान और सार्वभौमिक वस्तुओं का ज्ञान करना।


2. बोध -  अनुवाद करना, अर्थापन करना और गणना करना


3. प्रयोग -    सामान्यीकरण करना, उपचार करना, प्रयोग करना


4. विश्लेषण - तत्वों का विश्लेषण, संबंधों का विश्लेषण, व्यवस्थित सिद्धांतों का विश्लेषण


5. संश्लेषण -   नवीन योजना बनाना, तत्वों का अनोखा संप्रेषण, अमूर्त संबंध खोलना।


6. मूल्यांकन -  मूल्यांकन करना।



1. ज्ञान ( knowledge )  :- 


ज्ञान वर्ग के अंतर्गत विद्यार्थियों के प्रत्यास्मरण तथा ज्ञान की क्रियाओं को तथ्यों, शब्दों, सिद्धांतों, नियमों की सहायता से विकसित किया जाता है। 



विद्यार्थियों को सामान्यीकरण द्वारा परंपराओं का वर्गीकरण करके विभिन्न विधियों से अमूर्त संपत्तियों को समझने के लिए कसौटियो का ज्ञान करवाया जाता है। श्रेणीबद्ध करके वर्गीकरण के माध्यम से ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न किया जाता है जिससे बच्चे प्रत्यास्मरण तथा पहचान कर सकें।


उदाहरण के लिए हम इस तरीके से समझ सकते हैं कि गणित के शिक्षक द्वारा गणित का फार्मूला पढ़ाया जा रहा है तो यह ज्ञान हुआ और बच्चे ने इसे अच्छी तरह समझ लिया और याद कर लिया तो यह हुआ और जब  गणित के प्रश्नों को हल करते समय फॉर्मूला का उपयोग करेंगे तो यह प्रयोग हुआ।

 

2. बोध ( comprehension) :- 


बोध द्वारा ज्ञान की व्याख्या करना है। यही कारण है कि वह बहुत ही केकड़ी आए आप कौशल स्कूल में अधिक करवाए जाते हैं जिनमें बोध शामिल हो। विद्यार्थियों को सूचना और तथ्यों तथा मान्यताओं को समझाते समय यह जानना आवश्यक है कि क्या विद्यार्थी को इस ज्ञान का बोध हो रहा है अथवा नहीं। 


3. अनुप्रयोग ( application) :- 


प्रयोग के लिए ज्ञान तथा बोध स्तर का होना आवश्यक है। छात्र प्रयोग स्तर की क्रियाएं करने में तभी समर्थ हो सकता है जब किसी भी नियम तथा सिद्धांत का सामान्यीकरण उनकी गलतियों को सुधारना तथा पाठ्यवस्तु का प्रयोग करना भी संभव हो वह विद्यार्थी उचित ढंग से अपनी योग्यता अनुसार व्यक्तिगत परिस्थितियों में उस ज्ञान का प्रयोग कर सकें।


4. विश्लेषण ( Analysis) :- 


यह क्रिया ज्ञान, बोध, प्रयोग से उच्च स्तर की मानी जाती है। है इसके अंतर्गत तथ्यों, नियमों तथा सिद्धांतों के विशलेषण आते हैं। 

इसमें सामग्री को उसके तत्वों में बांटने को महत्व दिया जाता है। इन / हुए तत्वों में आपसी संबंधों की खोज और जिन तरीकों से वे संगठित होते हैं उन्हें शामिल किया जाता है।


5. संश्लेषण ( synthesis) :-


 इसे सृजनात्मक उद्देश्य भी कहते हैं इसमें विभिन्न तत्वों को एक नवीन रूप में व्यवस्थित किया जाता है। संश्लेषण में छात्रों को अनेक स्तों से तत्वों को निकालना होता है। इससे सृजनात्मक क्षमताओं का विकास होता है।


इससे सृजनात्मक क्षमताओं का विकास होता है। इसके निम्न स्तर होते हैं:-


1. तत्वों का अनोखा संप्रेषण करना।

2. तत्वों के अमूर्त संबंध निकालना।

3. नवीन योजना प्रस्तावित करना।


6. मूल्यांकन ( Evaluation) :-


 ज्ञानात्मक पक्ष का अंतिम और सबसे ऊंचा स्तर का उद्देश्य माना जाता है। इसमें पाठ्यक्रम की नयमों तथ्यों तथा सिद्धांतों के संबंध में आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाया जाता है।मन के संबंध में निर्णय लेने में आंतरिक तथा बाह्य मानदंड को प्रयुक्त किया जाता है।


इस प्रकार विभिन्न शिक्षण विषयों में नहीं पता क्यों सिद्धांत वादी की सहायता में ज्ञान से लेकर मूल्यांकन तक के उद्देश्यों की प्राप्ति कर के संज्ञानात्मक पक्ष को विकसित करने का प्रयास किया जाता है।


👉 भावात्मक उद्देश्य ( effective ) :-


  भावात्मक पक्षी के उद्देश्यों को निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकृत किया गया है:-


1. ग्रहण करना ( Receiving) :- 


यह सबसे निम्न स्तर का उद्देश्य है इसमें उद्दीपक की स्थिति के बारे में विद्यार्थियों को संवेदनशील बनाया जाता है इसमें छात्र क्रिया की चेतना को ध्यान में रखता है ग्रहण करने की तत्परता और अनियंत्रित अवधान द्वारा संवेदनशीलता बढ़ा दी जाती है इसकी तीन स्तर है:-


√  क्रिया की जागरूकता


√ ग्रहण करने की चाह


√ नियंत्रित ध्यान या चयनात्मक ध्यान


2. अनुक्रिया ( Responding ) :- 


छात्र को अनुक्रिया के लिए अभिप्रेरित किया जाता है। इसमें छात्र किसी कार्य में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। जब विद्यार्थियों में विभिन्न मानवीय मूल्यों की ग्रहण करने की इच्छा जागृत हो जाती है। तभी वह संबंधित शैक्षिक गतिविधियों में भाग लेना प्रारंभ करते हैं तथा सभी अनुप्रिया करने की इच्छा जागृत होती है।


 इस वर्ग के अंतर्गत अनुप्रिया स्वीकार अनुप्रिया इच्छा और संतोष नहीं होता है। जब कक्षा में छात्रों से प्रश्न पूछे जाते हैं तब वे इस प्रकार के व्यवहारों की अभिव्यक्ति विकसित होती हैं। 


3. अनुमूल्यन या मूल्यन  ( Valuing ) :-


 विद्यार्थियों की अनु क्रियाओं के आधार पर किसी वस्तु घटना आदि को व्यवहार की कसौटी पर पर रखकर उनका मूल्य निर्धारित करना ही  मूल्यन है। 


इस उद्देश्य से छात्रों में निम्न गुणों का विकास होता है :- 


• किसी मूल्य को स्वीकारना


 • मूल्य के लिए लगाव अभिरुचि


 • प्रतिबद्धता


4. संगठन या व्यवस्थापन ( Organisation ) :- 


कोई भी व्यक्ति किसी भी विचार या मूल्य की तरफ आकर्षित होकर उसके प्रति अनुक्रिया व्यक्त करता है और इस प्रकार उसे व्यक्तिगत तथा सामाजिक मूल्यों की प्राप्ति होती है।


5. विशिष्टीकरण या चरित्र निर्माण ( characterisatioz) :- 


 इसको उपर्युक्त चारों वर्गों को आधार के रूप में लिया गया है। इसमें मूल्यों के क्रम में स्थिरता आ जाती है इसका संबंध जीवन शैली से होता है।


👉 क्रियात्मक पक्ष के शैक्षिक उद्देश्य :-


 इसका वर्गीकरण सबसे पहले 1966 में सिम्पसन ने किया तथा बाद में हैरो ने इसके आगे विकास किया।


 इस उद्देश्य का संबंध मुख्य रूप से हस्त और कौशल ( Hand and skill) से होता है। 


इस उद्देश्य को हैरो ने निम्नलिखित 6 भागों में विभक्त किया:-

1. उद्दीपन :-


2. कार्य करना 


3. नियंत्रण


 4.समायोजन 


5. स्वाभावीकरण 


6. आदत पड़ना, निर्माण, कौशल / skill



तो दोस्तों, आज के पोस्ट में मैंने आपको bloom taxonomy | bloom taxonomy ke shakshik uddeshya ka vargeekaran के बारे में बताया। अगर आपके मन में कोई भी सवाल हो तो पूछ सकते हैं। मै पूरी कोशिश करूंगी कि आपके सवालों का जवाब दे सकूं।


धन्यवाद।

Post a Comment

0 Comments