Sharirik shiksha ka arth | sharirik shiksha ka awashyakta aur mahatv kya hai

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आज के पोस्ट में मैं आपको शारीरिक शिक्षा का अर्थ और शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व को बताने वाली हूं।


Sharirik shiksha ka arth | sharirik shiksha ka awashyakta aur mahatv kya hai


 शारीरिक शिक्षा का भाव तथा अर्थ भिन्न - भिन्न सभ्यताओं की गणना के हिसाब से परिवर्तित होता रहता है। वास्तव में शारीरिक शिक्षा के महत्व को कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया गया।

  

Sharirik shiksha ka arth | sharirik shiksha ka awashwakta aur mahatv kya hai


अधिकतर अभिभावकों, शिक्षकों तथा सामान्यजन ने इसका तात्पर्य शारीरिक प्रशिक्षण, खेलकूद, शारीरिक संगठन, स्वास्थ्य शिक्षा तथा मनोरंजन से लगाया है जो सर्वथा गलत है। 


शारीरिक शिक्षा की अवधारणा इसकी पुरानी रेखा से बिल्कुल अलग है। इसकी आधुनिक अवधारणा शारीरिक शिक्षा को औपचारिक विद्यालय शिक्षा का ही एक अंग स्वीकार करती है। इस घटना के होते हुए शारीरिक शिक्षा का वास्तव अर्थ समझना परम आवश्यक है।


शारीरिक शिक्षा का अर्थ


शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का ही एक अंग है जिसके द्वारा शारीरिक गतिविधियों की वास्तविक शिक्षा दी जाती है। 


गतिविधि अथवा क्रियाशीलता प्राकृतिक गुण है तथा विद्यार्थी इसे ग्रहण कर अपनी वृद्धि तथा विकास की रचना करते हैं। 


वस्तुतः शारीरिक शिक्षा शब्द अपने आप बिल्कुल विभिन्न अर्थ रखता है। इसमें विभिन्न विचारधाराओं को सम्मिलित किया गया है।


 प्रारंभ में शारीरिक शिक्षा का प्रयोग व्यक्ति के द्वारा की गई शारीरिक गतिविधियों के लिए किया जाता था। क्योंकि व्यक्ति का शरीर इन्हीं गतिविधियों तथा क्रियाशीलता से ही स्वस्थ बना रहता था किंतु शारीरिक शिक्षा की ओर विशेष ध्यान सर्वप्रथम प्राचीन काल में यूनान ने दिया गया।


 सुकरात, अरस्तू तथा प्लेटो जैसे दार्शनिकों के कथन अनुसार शारीरिक प्रशिक्षण युवाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है किंतु उस समय भी इस ओर इतना ध्यान नहीं दिया गया जितना कि दिया जाना चाहिए था।


इससे लोगों को अपार हानि ही हुई है फिर भी शारीरिक शिक्षा शरीर को बलशाली बनाती है, ज्ञान की वृद्धि करती है तथा बालकों की शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक विकास की प्रवृत्ति को स्वास्थ्य बनाए रखने में सहायता करती है।


 यही कारण है कि भारत सरकार ने शारीरिक शिक्षा को प्रमुखता प्रदान करते हुए इसे एक अनिवार्य विषय के रूप में विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में शामिल किया है।



 शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत छात्रों के लिए न केवल निरीधात्मक उपायों का समावेश होता है बल्कि उपचारात्मक उपायों का भी समावेश होता है।


  निरीधात्मक उपायों के द्वारा छात्रों को उन बातों का ज्ञान दिया जाता है कि जिनके द्वारा भी अपने स्वास्थ्य को अच्छा बना सके तथा भविष्य में किसी रोगों का शिकार ना हो सके और उपचारात्मक उपायों के द्वारा छात्रों को उन बातों की जानकारी प्रदान की जाती है जिससे वे अपने शारीरिक व मानसिक शक्ति स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखने का प्रयास करें।


शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता एवं महत्व


वर्तमान युग की समस्याओं में एक प्रमुख समस्या मानव की स्वास्थ्य संबंधी समस्या होती है। स्वास्थ्य का स्थान मानव जीवन में सर्वोच्च है। 


अंग्रेजी में एक कहावत भी है Health is wealth।  अर्थात स्वास्थ्य ही संपत्ति है लेकिन यह स्वास्थ्य रूपी संपति आज नष्ट हो रही है। 


क्योंकि इसका एक कारण तीव्र गति से होने वाला मशीनीकरण है जिसका सर्वाधिक दुष्परिणाम हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। आज शरीर की सक्रियता कम होती जा रही है। घर बाहर अधिकतर कार्य मशीन के द्वारा होने लगा है।


 मनुष्य उसका भी गुलाम होता जा रहा है और हाथ से कार्य करने की प्रवृत्ति नष्ट होती जा रही है।


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 हमारे जीवन यापन करने का तरीका परिवर्तित हो गया है। शारीरिक परिश्रम का महत्व घटता जा रहा है। व्यक्ति आगम फरोश हो गया है। शारीरिक परिश्रम का समय उसके पास नहीं है, यदि समय है तो वह करना नहीं चाहता।


 इसे बहुत सारे रोगों की बढ़ोतरी हो रही है। जिन के विषय में पहले लोग नहीं जानते थे। ब्लड प्रेशर, दिल का दौरा, मधुमेह, अवसाद, ब्लड कैंसर, इसके प्रमाण है।


  डायबिटीज के रोगियों की दिन प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है। इस रोग के बारे में चिकित्सकों का कहना है कि मनुष्य प्रतिदिन पैदल घूमे और अपने शरीर को सक्रिय रखने में उचित आहार का सेवन करें तो यह रोग नियंत्रण की स्थिति में रह सकता है और शरीर स्वस्थ होने पर व्यक्ति इस रोग से बच सकता है।


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 ऐसी स्थिति में शारीरिक शिक्षा हमारे लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकती है। यदि हमने इस समस्या की तरफ ध्यान नहीं दिया तो 1 दिन मानव जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। यदि आप मानसिक शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना चाहते हैं तो हमें शारीरिक शिक्षा के अध्ययन का सहारा लेना ही पड़ेगा। 


इस संदर्भ में डॉक्टर राधकृष्णन ने अपना मत प्रस्तुत किया है कि प्रकृति में मनुष्य मनोभौतिक है। वे शरीर रखते हैं जो वृद्धि के निश्चित नियमों का पालन करते हैं।


 उनको महान राष्ट्र बनाने के लिए शारीरिक शिक्षा का ज्ञान और शारीरिक शिक्षा का पालन अवश्य करवाना चाहिए।


 स्वामी विवेकानंद द्वारा शारीरिक शिक्षा के बारे में कहे गए यह आज अत्यधिक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक प्रतीत होते हैं, आज भारत की भागवदगीता की नहीं बल्कि फुटबॉल के मैदान की आवश्यकता है।


 यूनेस्को की एक रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि प्रत्येक मनुष्य की शारीरिक शिक्षा तथा खेलो पहुंच का मौलिक अधिकार होना चाहिए, जो उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए बहुत आवश्यक होता है।


 शारीरिक शिक्षा, शरीर का एक मजबूत ढांचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित तथा आसानी से कर सकता है।


 मांटेग्यू के मतानुसार शारीरिक शिक्षा न तो मस्तिष्क का और ना ही शरीर का प्रशिक्षण करती है बल्कि संपूर्ण व्यक्ति का प्रशिक्षण करती है।


डॉ रूपाली के अनुसार एक अस्वस्थ धनी व्यक्ति से वह स्वस्थ श्रमिक कहीं अधिक सुखी है। यह शारीरिक शिक्षा है जो व्यक्ति को स्वास्थ्य बनाती है। प्रकृति को निकट लाती है तथा उसके मन को उन्नत बनाती है।


 शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इसका महत्व निम्नलिखित बिंदुओं के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है:-

1.  शिक्षा की दृष्टि से महत्व

2. मस्तिष्क की जागरूकता

3. चरित्र निर्माण में सहायता

4.  संपर्क सूत्र में वृद्धि 

5. अनुशासन बनाए रखने में सहयोगी 

6. अवकाश के समय का सदुपयोग

7. व्यक्तित्व का विकास

 8. सहिष्णुता में वृद्धि

9. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार।


1. शिक्षा की दृष्टि से महत्व :- 


 शारीरिक शिक्षा, औपचारिक शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। आत: यह भी सामान्य शिक्षा के समान महत्वपूर्ण है।


 शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य तथा उद्देश्य यही है कि वह सामान्य शिक्षा के समान बच्चों का सर्वांगीण विकास में सहयोग दे।


बालको तथा युवकों को सामान्य शिक्षा का ज्ञान देकर उनके आचरण, व्यवहार एवं आदतों में परिवर्तन लाया जाता है। ठीक इसी प्रकार शारीरिक शिक्षा भी बालकों तथा युवकों को  स्वस्थ रहने के विषय में बताती है।


 जो युवक विद्यार्थी अच्छे स्वास्थ्य के निर्माण की ओर ध्यान देते हैं उनमें परिवर्तन लाती है उनको स्वास्थ्य के महत्व के विषय में बताती है। खेल के द्वारा बालक तथा युवक सच्चाई ईमानदारी, परोपकार, वीरता, अनुशासन आदि के गुण सीखते हैं जो सैद्धांतिक शिक्षा में भी काम आती है।


इस प्रकार शारीरिक शिक्षा का शिक्षा की दृष्टि से बहुत महत्व है। 


2. मस्तिष्क की जागरूकता :- 


 खेल खेलते समय खिलाड़ियों को अपना मस्तिष्क संतुलित रखना पड़ता है ताकि खेल में किसी प्रकार के त्रुटि ना हो जाए। खिलाड़ी जैसी परिस्थिति देखता है वैसा ही निर्णय लेता है।

अतः उसे अपना मस्तिष्क सदैव सजग अथवा जागरूक रखना पड़ता है। 


बिना सजग मस्तिष्क के कोई भी खिलाड़ी खेल में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है। यह एक ऐसा गुण है जो शारीरिक शिक्षा के माध्यम से आसानी से प्राप्त किया जा सकता है इसलिए शारीरिक शिक्षा में दिमाग की जागरूकता को महत्वपूर्ण माना गया है।


3. चरित्र निर्माण में सहायक :- 


 शारीरिक शिक्षा से चरित्र निर्माण में सहायता मिलती है। चरित्रवान व्यक्ति ही समाज तथा देश के लिए नैतिकता तथा आचरण के सूत्रों का विस्तार करता है।

 बालक तथा युवक शारीरिक शिक्षा के द्वारा संपन्न रहते हैं वे एक दूसरे के संपर्क में आते हैं इसे जीवन में हर्ष व उल्लास का वातावरण उत्पन्न होता है।

 इस प्रकार शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को अच्छा नागरिक बनाने में भी सहायता करती है।


4. संपर्क सूत्र में वृद्धि :- 


खेलों तथा खेलों से संबंधित प्रतियोगिताओं में विभिन्न जनपदों राज्यों तथा स्थानों के खिलाड़ी आते हैं। खेल - खेल में भी एक दूसरे के संपर्क में आ जाते हैं तथा घनिष्ठ मित्र हो जाते हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि शारीरिक शिक्षा मानवीय संबंधों की वृद्धि करने में सहायक है। 


5. अनुशासन बनाने में सहयोगी :- 


खेलों तथा प्रतियोगिताओं में अनुशासन बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए जाते हैं।

 खिलाड़ियों को उन्हीं नियमों के अंतर्गत खेलना पड़ता है। इसी प्रकार प्रशिक्षित शारीरिक शिक्षा का प्रशिक्षण देते समय भी नियमों का पालन स्वयं करता है तथा विद्यार्थियों से भी कराता है। इसे आत्मानुशासन तथा बाह्य अनुशासन दोनों बने रहते हैं। अतः ऐसा कहा जा सकता है कि शारीरिक शिक्षा शरीर है तो अनुशासन उस शरीर की रीढ़ की हड्डी है।


6. अवकाश के समय का सदुपयोग :-  


शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रकार की क्रियाएं की जाती है जिनसे बालको तथा युवकों का मनोरंजन भी हो जाता है।

 इससे अवकाश के समय का सदुपयोग हो होता है। मनोरंजन क्रियाएं मानसिक तनाव को दूर करती है तथा मन में उल्लास की छींटे भर देती है।


 7. व्यक्तित्व का विकास:-  


व्यक्तित्व का विकास तभी संभव है जब व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक, सामाजिक क्रियाएं विकास की सीधी रेखा पर चढ़ती है।

 इस दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि विकास के यह चरण शरीर के द्वारा ही संपादित किए जाते हैं। अच्छा व्यक्तित्व तथा स्वास्थ शरीर व्यक्ति को सुखी जीवन जीने में सहायता करती हैं।


 व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के आधार पर ही कठिन से कठिन कार्य सफलतापूर्वक संपन्न करने में समर्थ रहता है।


8. संवेगात्मक विकास :-


 शारीरिक शिक्षा से संवेगात्मक विकास भी होता है। जब बालक विभिन्न प्रकार के शारीरिक क्रियाएं करते हैं तो व्यक्ति के तनाव संवेदनशीलता आत्मसमर्पण के व्यवहार आदि से मुक्ति मिलती है।

 यदि किसी कारणवश मन में क्रोध के विचार हैं तो शारीरिक क्रियाएं से वे भी समाप्त हो जाते हैं।


 शारीरिक शिक्षा व्यक्ति की चिंता को कम करती है और उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।


9. स्वास्थ्य एवं रोगों का ज्ञान:-  


शारीरिक शिक्षा शरीर से संबंधित है। स्वास्थ्य तथा लोगों का सीधा संबंध शरीर से है।

अतः प्रशिक्षक शारीरिक क्रियाएं कराते समय अच्छे स्वास्थ्य तथा रोगों के संबंध में अनेक बातें बताते हैं। 


आधुनिक काल में जब विभिन्न प्रकार के रोग खानपान की खराबी, प्रदूषित वातावरण, प्रकृति का निरादर करने आदि के कारण उत्पन्न हो जाते हैं तो शारीरिक शिक्षा के द्वारा ही उन सब की जानकारी मिलती है तथा रोगों से बचा जा सकता है।


10. सहिष्णुता  में वृद्धि:- 


 सहिष्णुता तथा सहनशीलता मानव को दीर्घायु बनाती है इसलिए जिस व्यक्ति में सहनशक्ति की भावना है, वह समाज में संतुलित समायोजन कर लेता है।


 शारीरिक शिक्षा समय-समय पर विभिन्न प्रकार के अवसर प्रदान करती है जिनमें सहनशक्ति की वृद्धि की जा सकती है।


11. सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार :-


  समाज, राज्य तथा राष्ट्र में वही व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है जो व्यक्ति से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता है।

 खेलों में खिलाड़ी एक दूसरे के प्रतिद्वंदी होते हैं किंतु उन्हें खेल के अनुशासन सूत्र एक दूसरे से सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने के लिए बाध्य करते हैं।


 इस प्रकार शारीरिक शिक्षा के द्वारा युवको में सहयोग, भाईचारा, दयालुता, परोपकरिता, सेवा भावना आदि का भाव आता है जिससे मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है। 


आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा की अत्याधिक आवश्यकता है। शारीरिक शिक्षा से व्यक्ति में अनेकों गुण का सृजन होता है तो व्यक्ति दीर्घायु होता है।


 समय का सदुपयोग हो जाता है तथा अवकाश के समय उसका मनोरंजन भी हो जाता है। किसी भी राष्ट्र को संपन्न समृद्ध तथा सुखी बनाने के लिए ऐसी शिक्षा आवश्यक है जो व्यक्ति को स्वस्थ और सुखी बना सकती है। ऐसी शिक्षा शारीरिक शिक्षा ही है।


तो दोस्तों, आज के पोस्ट में मैंने आपको शारीरिक शिक्षा का अर्थ है, शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता और महत्व के बारे में बताया। दोस्तों, अगर आपके मन में इस पोस्ट से संबंधित कोई भी प्रश्न हो तो बेझिझक कमेंट करके पूछ सकते हैं। अगर यह पोस्ट अच्छा लगा हो तो प्लीज कमेंट, फॉलो और शेयर जरूर करें।

धन्यवाद।


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